बुधवार, 05 अग॰ 2026 हिंदी | EN
राज्यों से

हरी खाद से लागत कम होगी, पैदावार बढ़ेगी

11 अप्रैल 2026 0 व्यू
हरी खाद से लागत कम होगी, पैदावार बढ़ेगी

रायपुर। खेती की बढ़ती लागत और घटती मिट्टी की उर्वरता से जूझ रहे किसानों के लिए हरी खाद एक प्रभावी और किफायती समाधान बनकर उभर रही है। कृषि विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि वे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम कर हरी खाद का उपयोग करें। इससे न केवल खेती की लागत घटेगी, बल्कि प्रति एकड़ उत्पादन में भी वृद्धि होगी।

 

विशेषज्ञों के अनुसार हरी खाद के उपयोग से मिट्टी में नमी, आर्गेनिक कार्बन, नाइट्रोजन और सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है। साथ ही फास्फोरस, पोटाश, जस्ता, तांबा, मैंगनीज और लोहा जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता भी बढ़ती है। इससे मिट्टी की भौतिक, रासायनिक और जैविक संरचना में सुधार होता है और भूमि की उर्वरा शक्ति लंबे समय तक बनी रहती है। कृषि विभाग का कहना है कि रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से जहां एक ओर मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है, वहीं मानव स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर पड़ रहा है। ऐसे में हरी खाद जैसे जैविक विकल्पों को अपनाना समय की मांग है।

 

हरी खाद उन तेजी से बढ़ने वाली पत्तीदार फसलों को कहा जाता है, जिन्हें फल आने से पहले ही खेत में जोतकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। यह प्रक्रिया मिट्टी में जैविक पदार्थों और नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाने में सहायक होती है। लगभग 30 से 40 दिनों में तैयार होने वाली इन फसलों को मिट्टी में मिलाने के बाद 10 से 15 किलोग्राम यूरिया का छिड़काव करने से उनका विघटन तेज होता है और पोषक तत्व शीघ्र उपलब्ध हो जाते हैं। विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि हरी खाद को बहुत गहराई में नहीं मिलाना चाहिए, ताकि पोषक तत्व आसानी से फसल की जड़ों तक पहुंच सकें। सही अवस्था में खेत में पलटने से अधिकतम नाइट्रोजन का लाभ मिलता है।

 

किसानों को सनई (सनहेम्प), ढैंचा, लोबिया, उड़द, मूंग और ग्वार जैसी दलहनी फसलों के उपयोग की सलाह दी जा रही है। इनकी विशेषता है कि ये कम समय में तेजी से बढ़ती हैं, कम पानी और उर्वरक में भी अच्छी जैविक मात्रा प्रदान करती हैं। सनई अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त, ढैंचा सूखे और क्षारीय भूमि में उपयोगी, ग्वार कम वर्षा और रेतीली भूमि के लिए बेहतर, लोबिया अच्छे जल निकास वाली भूमि के लिए, मूंग-उड़द खरीफ एवं ग्रीष्मकालीन फसलों के रूप में उपयोगी है। इन फसलों की जड़ों में पाए जाने वाले जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करते हैं, जिससे प्रति हेक्टेयर 40 से 50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 10 किलोग्राम फास्फोरस और 20 किलोग्राम पोटाश की पूर्ति होती है।

 

हरी खाद के उपयोग से मिट्टी भुरभुरी होती है, जलधारण क्षमता बढ़ती है, वायु संचार बेहतर होता है और अम्लीयता/क्षारीयता में संतुलन आता है। साथ ही मृदा क्षरण में कमी आती है और मृदाजनित रोगों का प्रकोप भी घटता है। यह टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के साथ पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक है। कृषि विभाग ने हरी खाद अपनाने के इच्छुक किसानों से अपील की है कि वे अपने विकासखंड के वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी कार्यालय से संपर्क कर तकनीकी मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं।