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कुछ भी लिखा हुआ सामान्यीकरण नहीं होता, सापेक्ष ही होता है

कुछ भी लिखा हुआ सामान्यीकरण नहीं होतासापेक्ष ही होता है। कितनी भी सावधानी बरत लो तब भी पूर्ण सत्य कभी लिखा/कहा या सोचा जा ही नहीं सकता।

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एक ही बिंदु को देखने के अनन्त कोण होते हैं। इसलिए किसी भी समय शब्दों के रूप में हमारे मनवचन या लेखन में आया कोई भी विचार एक ही समय में सत्य और असत्य दोनों ही सिद्ध हो जाता है।

सारे पॉइंट ऑफ़ व्यूज से मैं जब भी अपने लिखे को जांचने की कोशिश करती हूँ तो उसे असत्य ही पाती हूँ। इसलिए कभी-कभी लिखते-लिखते रुक जाती हूँ और कभी-कभी लिखकर मिटा देती हूँ।...और भीतर कहीं गहराई में मैं सब कुछ की तरह ही लिखना भी छोड़ना चाहती हूँ। यह कोई पलायन नहीं...यह विरोधाभास और द्वन्द्वों जनित इस समस्त जीवन से मुक्ति की ही तड़प होती है जो दुनिया के हर एक प्राणी के भीतर दबी रहती है। मुख्य रूप से कर्मयोग का सिद्धांत समाधान रूप में यही से निकलता है।

बाकी बात बस इतनी सी है कि सापेक्षता के दृष्टिकोण से सभी का लिखने का तरीका यही रहेगा। जरुरत बस समझ और जागरूकता के बढ़ाने की है तब आवश्यक क्या है और अनावश्यक क्या है यह अपने आप स्पष्ट होता जाएगा।